मैने कहीं पढ़ा था की –

मौत भी ज़रूरी है ज़िंदगी भी प्यारी है

ख्वाहिशों से जुए में मैने शाम हारी है…!!!

इसे मैं अपनी ज़िंदगी पर लागू कर सकता हूँ…


तभी ‘जीवन’ ने कहा की – शाम को हार कर रात भी तो पाई है!
वाह!बेहतरीन हस्तक्षेप!

लेकिन उस रात को तो अभी तलाश रहा हूँ मैं…
वो रात जब मैं सो सकूँ…
वो रात जब मैं ख्वाबों में खो सकूँ…
वो रात जब मैं दिल से रो सकूँ…
वो रात जो काली ना हो…
वो रात जो खाली ना हो…


क्या कोई शाम ऐसा रास्ता बनाएगी?
क्या कोई शाम ऐसा दर्द जगाएगी?
क्या खिलखिलती धूप शाम पर चढ़ जाएगी…
और ऐसी रात जिसकी सुबह ना हो वो आएगी !!!

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