सोचते – सोचते मैने कुछ ऐसा सोचा की मेरे अंदर सिरहन सी महसूस हुई.
मैने सोचा क्या होगा हमारे जीवन का (या हमारे ब्लॉग का, या हमारे मीडीया का) अगर इसमे पॉलिटिक्स ना हो, और बॉलीवुड
भी ना हो और क्रिकेट भी ना हो…सब सन्न्न्न्न्न
बहुत सोचा जब यह कुछ नहीं है तो क्या लाइफ में खुजली करूँ सिर्फ़..?
.यह प्रश्‍न मैने समान विचारो वाले मित्रों के सामने रखा – 
मेजॉरिटी दुराचारियों का जवाब दुराचारी ही था-सेक्स/ 
मई बोला सेक्स तो पॉलिटिक्स में है और बॉलीवुड में भी. और आई.पी.एल के बाद तो यह क्रिकेट में भी है. तो सेक्स  इन तीनो के साथ ही ठीक लगता है….इनके बिना वो ख़तरनाक होता है, गैर-क़ानूनी होता है –  खैर सेक्स और क़ानून से ध्यान आया – फिर ग़लत सोचा की भाभी कैसी हैं ?-नहीं बल्कि यह ध्यान आया की क्या होता अगर समाज में क़ानून नही होता – ट्रॅफिक में चलते हुए, बाज़ार में घूमते हुए जिस क़ानून को हम तोड़ने में अपनी शान समझते हैं अगर वो ना होता तो क्या होता ? हम…हाँ हम…भूखे भेड़िए होते. यह मत सोचना की कैसे? और फिर मैने सोचा अगर कानून ना होता तो सिर्फ़ सेक्स होता. वो ही कहना चाहता हूँ जो आप सोच रहे हैं. सही मायने में आदमी कुत्ता होता !!! और महिलायें भी कम नहीं होती. अब जब में सड़कों से गुज़रता हूँ तो अपनी शर्ट और ज़िप देखता रहता हूँ कहीं कुछ खुला तो नहीं रह गया. अगर क़ानून ना होता तो में कहाँ जाता !
अभी कुछ रोज़ पहले खबर आई थी की ब्लॉग पर बरखा डट(Dutt) को अपमानित करने वाले एक भाई ने क़ानून का डंडा लगने पर माफी मांग ली  थी. क़ानून का डंडा शरीफ के लिए बहुत बड़ा होता है. लेकिन ‘शरीफ’ ही उस डंडे का जवाब दे सकता है  – जैसे की हमारे ‘भाड़ास’ भाई. www.bhadas4media.com जूझ रहे हैं HT जैसे बड़े ग्रूप से. क्यूंकी उन्हे मालूम है की वो सही है और उनको जानने वाले जानते हैं की वो ग़लत हो ही नहीं सकते … and this is the real issue.

So, as a reader you must be thinking that why i trivilised a serious issue. It is because in order to sensationalise issue, media now forgets the real one. Or their severity. National enemes like Kasav are trivilising the judiciary. But the media is lost in the dual – IPoliticalL And IPL 2 SA. It has gone to such extent that line between editorial and advertising has been lost. Result is commercialised media and cheated reader. Link of some of the advertising innovation or goof-ups from Hindi Hindustan on eve of elections in Bihar ( http://www.bhadas4media.com/index.php?option=com_content&view=article&id=1374:election-press&catid=28:print-media&Itemid=57 ).

So no personnal comment intended. I fear ‘kanoon ka danda’ and ‘sansani’…

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