कदम कदम पर
समय पुकार रहा है,
थम- ऐ- इंसान
क्यूँ दौड़े जा रहा है…

वो कब आख़िरी बार था
जब हम साथ हँसे थे,
उनकी आँखों के साथ
हमारे आँसू बहे थे…

क्यूँ भूल गये हम
मासूम वो स्पर्श,
क्यूँ लिए बाहों में
गुज़र गये बरस…

आँधी दौड़ में
खो गयी दोस्ती,
loosing-it
इतने अकेले हो गये
सोने का मोल मिट्टी

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