यहाँ हर शक्श परेशान है
माथे पर शिकन है
मन बैचैन है
लबों पर कंपन है
आँखें ढून्डती निशान है
यहाँ हर शक्श परेशान है…

जाना था कहीं
पहुँच गये कहीं
किस्मत नाराज़ है
ख़तम हुई आस है
पिंजरे में क़ैद जान है
यहाँ हर शक्श परेशान है…

सब ओढ़े ख्वाइश की चादर
दौड़े जा रहे इधर-उधर
अरमानों को कुचले हुए
आँसुओं को रोके हुए
खोए अपनी पहचान है
यहाँ पर हर शक्श परेशान है…

अपनी धुन में चले जा रहे
अपनों को पीछे छोड़ते हुए
सपनों की चाहत में
अपने आज को भूलते हुए
खुद से ही अब अंजान है
यहाँ हर शक्श परेशान है…

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