मैं बैठे पेड़ को देखे था…
जो सूखा था, जो रोता था…
मुझे लगा मेरी ज़िंदगी,
उसके पत्ते सी कहीं खो गयी !!

पहले साँसों की छाँव थी…
पहले हँसने की गंध थी…
पहले ओस की बूँदें थी ….
पहले सहारे की मिट्टी थी…
मुझे लगा मेरी ज़िंदगी,
उसके पत्तों सी कहीं खो गयी !!!

पहले जन्नत की चाहत थी…
पहले खामोशी में गूँज थी…
पहले आँसू में मोती थे…
पहले अंगराई मदहोश थी…
मुझे लगा मेरी ज़िंदगी,
उसके पत्तों सी कहीं खो गयी !!!

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